राजनैतिक हल्के में बड़ी चर्चा है कि क्या राजस्थान में राजपाट के समीकरण बदलेंगे? और इस चर्चा के कारण भी है।
विधायक घनश्याम तिवाड़ी पार्टी के सबसे वरिष्ठ विधायक तो हैं ही, साथ ही ब्राह्मण समाज पर भी पकड़ मजबूत है। परंतु सूबे का पार्टी नेतृत्व तो राष्ट्रीय नेतृत्व से ही तिवाड़ी को निकलवाने की तिकड़म करता रहा है। क्योंकि खांटी संघी विधायक घनश्याम तिवाड़ी पिछले 4 वर्षो से राजस्थान की मुख्यमन्त्री वसुंधरा राजे के प्रति तीखे और बागी तेवर अपनाने नाते रहे है।
इस पर प्रदेश नेतृत्व हमेशा ही उनको पार्टी से निकालने की धमकी देता रहा। यह बात अलग है कि हकीकत में कुछ कर नहीं पाया। प्रदेश में अब जब विधानसभा चुनाव में सिर्फ छह महीने का समय ही बचा है तो ऐसे में कार्रवाई करने से भाजपा बचना चाहती है। पार्टी तो यही चाहती है कि तिवाड़ी खुद ही छोड़ जाएं। जबकि बुजुर्ग नेता की मंशा है कि पार्टी उन्हें निकाल दे। तिवाड़ी जी स्वयम् सियासी चालों के धुरंधर खिलाड़ी जो ठहरे।
पूर्व की भाजपा सरकारों में मंत्री रहे तिवाड़ी का अपना कद इतना बड़ा है कि संघी खेमे के कई केंद्रीय नेता चाहते हैं कि उन्हें पार्टी की मुख्यधारा में फिर से शामिल किया जाए। चुनाव में भी इससे फायदा पहुंचेगा। केंद्रीय नेतृत्व को ऐसे कई नेताओं ने तर्क भी दिया कि जब राजे अपने कट्टर विरोधियों मसलन विधानसभा अध्यक्ष कैलाश मेघवाल और वरिष्ठ विधायक प्रहलाद गुंजल को अपना सकती हैं और हाल में तो उन्होंने धुर विरोधी रहे किरोड़ी लाल मीणा को भी न केवल पार्टी में शामिल कराया बल्कि लगे हाथ राज्यसभा में भी पहुंचा दिया। तो फिर तिवाड़ी से ही परेशानी क्यों है।
मेघवाल को दलित तबके की वजह से तो प्रहलाद गुंजल को गुर्जर समाज को साधने के कारण ही राजे ने पार्टी की मुख्यधारा में लाकर अपनी स्थिति को पिछले विधानसभा चुनाव में मजबूत बनाया था। अब मीणा समाज का समर्थन लेने के मकसद से किरोड़ी लाल को जोड़ा है। ऐसे तर्कों से केंद्रीय नेतृत्व भी अपनी सहमति दिखा भी रहा है। पार्टी में राजे विरोधियों की दलील है कि तिवाड़ी पार्टी से तो नाराज हैं नहीं। उन्हें तो दिक्कत मुख्यमंत्री की कार्यशैली को लेकर है। तिवाड़ी का मामला लंबा खिंचने से भी पार्टी का एक तबका अब मान रहा है कि उनकी सम्मानजनक वापसी का रास्ता तलाशा जा रहा है।
राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह कर्नाटक चुनाव के बाद जब प्रदेश का दौरा करेंगे तब तिवाड़ी पर भी फैसला हो जाएगा। इसके साथ ही केंद्रीय नेतृत्व को उम्मीद है कि अशोक परनामी की जगह सूबेदारी संभालने वाले गजेंद्र सिंह शेखावत खुद खोज लेंगे इस पहेली का हल। परनामी को तो यूं भी वसुंधरा का जेबी सूबेदार माना जाता रहा है। शेखावत अपने विवेक से करेंगे फैसले। यानी, उम्मीद की जा सकती है कि अब तिवाड़ी का वनवास किसी भी दिन खत्म हो सकता है।
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